हिन्दू धर्म में शास्त्रों के अनुसार की गयी वैदिक पूजा को ही सर्वश्रेष्ठ पूजा कहा गया है यदि पूर्ण श्रद्धा एवं विधि विधान से पूजा आराधना कि जाये, तो अवश्य ही सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। अतः साधक को किसी कार्य को पूर्ण करने में अड़चनें आ रही हो, या किसी कारणवष वह कार्य पूर्ण नहीं हो रहा हो, या आपका मन अशांत रहता है तो इसका मतलब है कि आप कि पूजा-पाठ में कहीं कुछ गलत हो रहा है | पूजा उपासना कैसे की जाये इसके लिए भी हमारे धार्मिक ग्रंथों में कुछ नियम व परंपराएं बनाई गई है, जिनका पालन करना ही हमारी सफलता की सीढ़ी है। सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए. प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए. इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है। किस पूजा के लिए कैसा आसन, कैसा दीपक, कैसी माला उत्तम है। उसके बारे में विवरण निम्न हैः- नित्य पूजा सामग्री भगवान की मूर्ति या तस्वीर पुष्प/माला रोली/कुंकु चन्दन अक्षत/चावल चन्दन सिंदूर दिया/बाती तेल घी अगरबत्ती/धूपबत्ती जल का...
पूजा के लिए शास्त्र सम्मत विधान की जानकारी होना अति आवश्यक है और उसके लिए आवश्यक है कि पूजा करने के लिए कौनसा आसन उचित है, दीप किस प्रकार का होना चाहिए, माला कौन सी अनिवार्य होगी व पूजा का तरीका क्या होगा आदि इन बातों पर ध्यान दे तो हम अपनी पूजा को एक संपूर्ण व श्रेष्ठ पूजा बना सकते हैं। हमारे शास्त्रों के अनुसार जिस स्थान पर प्रभु को बिठाया जाता है उसे दर्भासन कहते हैं और जिस पर स्वयं साधक बैठता है, उसे आसन कहते हैं। विद्वानों की भाषा में यह शरीर भी आसन है और प्रभु के भजन में इसे समर्पित करना सबसे बड़ी पूजा है। साधक को कभी जमीन पर बैठ कर पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से पूजा का पुण्य भूमि को चला जाता है नंगे पैर पूजा करना भी उचित नहीं है, हो सके तो पूजा का आसन व वस्त्र अलग रखने चाहिए। जो शुद्ध रहे लकड़ी की चौकी, घास फूस से बनी चटाई, पत्तों से बने आसन पर बैठ कर पूजा करने से भक्त को मानसिक अस्थिरता, बुद्धि की भटकन, मन की डांवांडोल स्थिति, उच्चाटन, रोग-शोक आदि देते हैं। अपना आसन, माला आदि किसी को नहीं देने चाहिए। इससे पुण्य कम हो जाता है। किस पूजा के लिए कैसा आसन उ...